वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

    ट्रस्ट श्री ठाकुर जी महाराज

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    बानारसी तीर्थ मंदिर

    बानारसी तीर्थ मंदिर

    गोविंदपुर, उत्तर प्रदेश

    📖परिचय

    यह प्राचीन मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यहाँ एक तालाब भी है जिसे 'छोटी गंगा' कहा जाता है। वहाँ नहाना पवित्र माना जाता है।

    📜इतिहास

    बनारसी तीर्थ जिसे भगवान शिव ने बाणासुर के तप से प्रसन्न हो वरदान में दिया था।

    हरदोई, 23 नवम्बर। संडीला–हरदोई क्षेत्र का प्रख्यात तीर्थ बनारसी तीर्थ को दैत्यराज बाणासुर के कठोर तप से प्रसन्न आशुतोष भगवान शिव द्वारा दिए गए वरदान के रूप में माना जाता है। भगवान भोलेनाथ की कृपा से प्रकट हुए इस सरोवर को आने वाले श्रद्धालु अमृततुल्य गंगाजल के समान ही पवित्र मानते हैं तथा इसमें डुबकी लगाने मात्र से उनकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

    संडीला से लगभग 12 किलोमीटर दूर मुख्य मार्ग पर, सीमा से लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बनारसी तीर्थ एवं वहाँ स्थित भगवान शिव का भव्य मंदिर लगभग छह हजार वर्ष पुरानी कथा को जीवंत करता हुआ लोगों की श्रद्धा और आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। प्रत्येक माह की पूर्णिमा तथा प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लाखों श्रद्धालु यहाँ पहुँचकर अपनी धार्मिक पिपासा शांत करते हैं और मनवांछित फल प्राप्त करते हैं। बनारसी तीर्थ के अतीत में झाँकने पर कई रोचक तथ्य सामने आते हैं, जिनके आधार पर इस तीर्थ को साक्षात गंगा जी के अवतार के समान माना जाता है।

    काफी छानबीन और दर्जनों बुजुर्गों से संपर्क के पश्चात जो निष्कर्ष निकला, उसके अनुसार हिरण्यकश्यप की पाँचवीं पीढ़ी में उत्पन्न बाणासुर (हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद, प्रह्लाद के पुत्र विरोचन, विरोचन के पुत्र बलि तथा बलि के पुत्र बाणासुर) और भगवान श्रीकृष्ण के मध्य द्वापर युग में एक संग्राम हुआ था। बाणासुर भगवान भोलेनाथ का अत्यंत मान्य भक्त था। शिवजी की कृपा प्राप्त करने के लिए उसने अपनी राजधानी सोनिकपुर धाम, जनिगांव के निकट शिवलिंग की स्थापना की।

    भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बाणासुर प्रतिदिन गंगा जी का जल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करता था। इसके लिए वह प्रतिदिन सोनिकपुर से बिठूर तीर्थ जाता था और वहाँ से सूर्योदय से पूर्व जल भरकर लाता था। उसका यह कठोर तप सैकड़ों वर्षों तक चलता रहा।

    एक दिन बाणासुर की धर्मपत्नी ने उसे दांपत्य जीवन के लिए प्रेरित किया। इस कारण वह रात्रि में रुक गया और प्रातः समय से जाग नहीं सका। परिणामस्वरूप वह देर से गंगाजल लाने के लिए निकला। सोनिकपुर और बिठूर के बीच लगभग 40 किलोमीटर का मार्ग तय करना उसके लिए कठिन हो गया। सीमऊ के निकट गोविंदपुर ग्राम के पास जंगल में सूर्योदय होता देख बाणासुर निराश हो गया और वहीं आँख बंद कर भगवान शिव का ध्यान करने लगा।

    उधर उसकी पत्नी ने भी भगवान भोलेनाथ से प्रार्थना की कि उसके कारण उसके पति की तपस्या खंडित हो रही है। कृपालु भोलेनाथ ने दोनों की प्रार्थना स्वीकार की और आकाशवाणी हुई—“हे बाणासुर, उठो, स्नान करो, गंगाजल लेकर शिवजी पर चढ़ाओ।” जब बाणासुर ने आँख खोली तो उसके सामने एक विशाल सरोवर दिखाई दिया, जो साक्षात गंगा जी का प्रतिरूप था। उसने उस सरोवर में स्नान किया, पूजा की और जल लेकर सोनिकपुर पहुँचा तथा शिवजी को अर्पित किया। तभी से उस सरोवर का नाम बनारसी तीर्थ पड़ गया।

    आज भी लाखों श्रद्धालु इस सरोवर को गंगा जी के समान पवित्र मानकर इसमें स्नान करते हैं। प्रारंभ में सरोवर के निकट कोई मंदिर नहीं था। बाद में पड़ोसी गाँव रामपुर गढ़ीवा के जमींदार पूरन शाह ने लगभग 250 वर्ष पूर्व पक्का घाट तथा भगवान शिव और हनुमान जी के मंदिर का निर्माण करवाया। यह शिव मंदिर 18 वर्षों में बनकर तैयार हुआ।

    पूरन शाह के स्वर्गवास के बाद उनकी धर्मपरायण पत्नी श्रीमती बिट्टा देवी ने हनुमान मंदिर की स्थापना करवाई। 17 अप्रैल 1857 को स्वर्गीय पूरन शाह के भतीजे रामदीन शाह ने मंदिर और तीर्थ स्थल के रखरखाव तथा आर्थिक सहयोग के उद्देश्य से अपनी जमींदारी का एक हिस्सा मंदिर के नाम दान कर वक्फनामा लिखा। जमींदारी उन्मूलन के पश्चात उनके पौत्र गोविंद प्रसाद गुप्ता प्रबंधक बने। उनके निधन के बाद उनके भतीजे हरिशंकर गुप्ता ने व्यवस्था संभाली।

    बाद में जयपुर में शिक्षक होने और व्यवस्था सँभालने में असमर्थता के कारण अन्य सदस्यों की सहमति से रामपुर गढ़ीवा के मूल निवासी एवं वर्तमान में रेलवे क्रॉसिंग, संडीला निवासी दिनेन गुप्ता को मंदिर का अध्यक्ष व प्रबंधक नियुक्त किया गया।

    समय बीतने के साथ शिव मंदिर जर्जर हो गया। लगभग पाँच वर्ष पूर्व विश्वनाथ गुप्ता को स्वप्न में भगवान शिव के दर्शन हुए और मंदिर के जीर्णोद्धार का संकेत मिला। इसी दौरान उनकी तबीयत बिगड़ गई और पीजीआई से निराशाजनक उत्तर मिला, लेकिन दिसंबर 2002 में लखनऊ से लौटने के बाद उन्होंने पूर्णिमा के दिन सरोवर में स्नान किया और शिव मंदिर में दर्शन किए, जिससे वे पूर्णतः स्वस्थ हो गए।

    इसके बाद भगवान शिव की प्रेरणा से उन्होंने मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य प्रारंभ कराया और लगभग दस लाख रुपये की लागत से एक विशाल सत्संग हाल का निर्माण कराया। मंदिर और घाट का कार्य निरंतर जारी है। वर्तमान में हनुमान मंदिर में पंथ आदि लगाने का कार्य चल रहा है। इसके अतिरिक्त रामनारायण दास के नेतृत्व में संत समाज द्वारा वहाँ एक रैन बसेरा भी बनवाया जा रहा है।

    🏛️सुविधाएं

    प्रसाद वितरणभंडाराधर्मशाला

    दर्शन समय

    सुबह 5:00 बजे से रात 9:00 बजे तक

    🪔विशेष पूजा

    महाशिवरात्रि, सावन सोमवार, कार्तिक पूर्णिमा

    फ़ोन

    +91 70072 92112

    🖼️चित्र दीर्घा

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    📍 स्थान मानचित्र